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ek budhe pita ki kahani - एक बूढ़े पिता की कहानी

ek budhe pita ki kahani - एक बूढ़े पिता की कहानी 





           गिरनार नाम का एक शहर था। गाँव में जय नाम का एक लड़का रहता था उसका जन्म एक गरीब परिवार में हुवा था जय के घर की हालत बिलकुल भी अच्छी नहीं थी उसके पिता गाँव में छोटा मोटा काम करते और माँ गाँव मे लोगो के घर बर्तन माजने जाती थी। 

           जय अपने माता पिता से काफी नफरत करता था क्युकी वो लोग उसकी एक ख्वाइश भी पूरी नहीं करते थे इस लिए गुस्से में हमेंशा एक बात कहता की वो एक दिन ये घर छोड़ कर चला जायेगा और फिर कभी भी वापस नहीं आएगा। जय के माता पिता को भी दुःख होता था की वो  इच्छा पूरी कर नहीं पा रहे हे पर वो भी क्या करते उनके पास जितने भी पैसे बचते वो घर चलाने में ही निकल जाते थे। जय पढाई में काफ़ी अच्छा था वो एक बार कोई भी पुस्तक पढता फिर उसे वो पढ़ने की ज़रूरत नहीं रहती थी। पर स्कूल की फ़ीस भर ने के भी उसके माता पिता के पास पैसे नहीं थे इस लिए कभी कभी उसकी माँ घर पर ही उसे पढ़ाया करती थी पर उसे पढ़ना लिखना बहोत जल्दी आ गया था। जय का गाँव में एक बहोत अच्छा दोस्त भी था। उसका नाम करण था। करण को ये बात पता थी की जय के घर की हालत बिलकुल भी अच्छी नहीं है इस लिए वो स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं आ सकता। करण उसकी मदद करना चाहता था इस लिए स्कूल का जैसे ही १ साल ख़तम होता था वो उसकी सारी किताब जय को दे देता था जय का दिमाग इतना तेज़ था की वो एक बार में काफी किताब पढ़ लेता था। जय ने इसी प्रकार स्कूल की पढाई पूरी कर ली। करण गाँव में ही स्कूल की पढाई ख़तम होने के बाद उसके पिताजी के व्यवसाय में जुड़ गया पर जय के पिता का तो कोई भी व्यवसाय नहीं था और वो अब पढाई करने के लिए बहार जाना चाहता था। 

          जय ने उसके माता पिता से कहा की वो पढाई करने के लिए शहर जाना चाहता है जय के माता पिता ने कहा हम थोड़े दिन बाद इस बारे में बात करेंगे उसके माता पिता सोच में पद गए की जय को शहर पढाई करने के लिए जाने दे या नहीं और अगर जाने भी दे तो उसके वह रहने खाने पिने का खर्चा पढाई का खर्चा इतने सारे पैसो का इंतज़ाम हम कैसे करेंगे। माँ ने कहा आज तक हमने जय के लिये कुछ भी नहीं किया है उसकी कोई इच्छा पूरी नहीं की हे अब हमें इस बार उसे शहर में पढाई करने की इच्छा पूरी करनी चाहिये। जय के पिता भी इस बात से सहमत हो गये। और वो दोनों जा के लिये पैसे इकठे करने लगे उनसे जितने भी पैसे इकठे हुवे वो सारे पैसे जय को दे दिये जय ने कहा बस इतने से पैसे !! इसमें क्या होगा पिता बोले हम तुम्हारे लिये इतने ही पैसे जोड़ पाये है अब हमारे पास पैसे नहीं है जो पैसे हमने घर चला ने के लिये बचाये थे वो भी इसमें जोड़ दिये है। ज़्यादा पैसे ना मिलने के कारण जय गुस्सा हो जाता हे और उसी वक्त घर छोड़ कर शहर जाने के लिये निकल पड़ता है।  जय का इस प्रकार घर छोड़ ने का सघमा माँ बर्दाश नहीं कर पाती और थोड़े समय में उनका देहांत हो जाता है। पिता अब घर में पूरी तरह अकेले रह गये थे। 

           शहर में जाके बड़ा आदमी बन ने के लिये जय ने दिन रात एक कर दिये कुछ साल तो शहर में पैसे ना होने की वजह से उसे बहोत तकलीफ होती कभी कभी तो बिना खाये ही उसे सोना पड़ता था। पर उसने मेहनत करना नहीं छोड़ा और देखते ही देखते कुछ साल में जय का नाम शहर के सबसे बड़े आदमी में आने लगा। उसकी कामयाबी आसमान छूने लगी। इतनी मेहनत और परिश्रम करने के बाद उसे एक बात पता चल गयी थी की पैसे कमाना आसान नहीं होता और ईमानदारी से पैसे कमाना तो बिलकुल भी आसान नहीं होता। जय को अब उसके माता पिता की मजबूरी का अहसास होने लगा कभी कभी वो ये भी सोचता की माता पिता को पत्र लिख के माफ़ी मांगू और उनको बताऊ की वो उनसे कितना प्यार करता है पर काम उसे काम से कभी भी फुर्सत ही नहीं मिलती और जिस दिन वो अपने माता पिता को पत्र लिखता ही उसी वक्त उसके ऑफिस में एक पत्र आता है और वो पत्र गाँव से उसके दोस्त करण ने भेजा था करण का पत्र देखते ही जय ख़ुश हो गया पर जब उसने पत्र पढ़ा तो उसकी ख़ुशी दुःख में बदल गयी पत्र में लिखा था की तुम्हारे पिता की मृत्यु हो गयी है। 

         जय तुंरत ही गाँव के लिये निकल जाता हे और रास्ते में सोच लिया की  की अब वो  उसकी माँ के साथ ही वो रहेगा उसे ये बात नहीं पता थी की जिस दिन वो घर छोड़ कर गया था उसके थोड़े दिन बाद ही उसकी माँ की मृत्य हो गयी थी गाँव में पोहच कर जय पहले अपने पिताजी के पास गया और पैर पकड़ कर उनसे माफ़ी मांगी जय उसकी माँ को ढूंढ रहा था वो उनसे भी माफ़ी मांगना चाहता था करण वही खड़ा था जय ने करण से पूछा मेरी माँ कहा है करण बोला तुम्हरी माँ तो तुम जिस दिन गये उसके थोड़े दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी थी। जय ज़ोर ज़ोर से रोने लगा और  कहा मुझे मेरी माँ का अंतिम संस्कार करने का भी मौका नहीं मिला। में कभी भी एक अच्छा बेटा नहीं बन पाया करण जय को संभालता है और कहता हे तुमको गलती  का अहसास हो गया इसका मतलब तुम्हे तुम्हारे माता पिता की माफ़ी भी मिल गयी है। करण ने कहा अब बहोत समय हो गया है तुमको अब पिता का अंतिम संस्कार करना पड़ेगा जब जय अंतिम संस्कार करके घर आता है घर में देखता हे की उसकी सारी बचपन की चीज़ बहोत संभाल के रखी थी घर में उसे अपनी सारी पुराणी बाते याद आ रही थी। 

           घर में जय अपनी सारी चीज़े देख रहा था और वहां पास में एक अलमारी भी थी अलमारी में से जय को १ पत्र मिलता है वो पत्र उसके पिता ने लिखा था। पत्र में लिखा था की जय ! तुम हमेशा के लिये यहाँ से जाने की बात किया करते थे पर में तो हमेंशा तुम्हे देख कर ही जिया करता था तुम्हारे जाने के कुछ दिन बाद ही तुम्हारी माँ ने भी मेरा साथ छोड़ दिया है अब मेरा यहाँ कोई नहीं है तुम्हारी बचपन की चीज़ देख कर ही में जी रहा हूँ। तुमको देख कर ही हमें हमारी जीने की वजह दिखाई दे रही थी। में तो उसी दिन मर गया था जिस दिन तुम हमेंशा हमेंशा के लिये ये घर छोड़ कर चले गये थे। पत्र में आगे लिखा था की बेटा ! हमने तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी नहीं की है हो सके तो हमको माफ़ कर देना इतना पढ़ते ही जय की आँख में आँसू आ जाते हे। 

         माता पिता उनसे जितना भी हो सकता हे वो सब कुछ करते हे उनके प्यार को कभी भी पैसो के साथ तुलना मत कर ना और अगर आपसे भी कोई गलती हुवी हे तो तुंरत माफ़ी मांग लीजिये। क्युकी एक बार समय चला गया तो ना माफ़ी मांग ने का मौका मिलेगा ना वो इंसान वापस आयेगा। 

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